नवजोत सिंह सिद्धू कैप्टन अमरिंदर को हराकर भी क्यों दिख रहे पराजित, चन्नी के CM बनने से पलटा गेमप्लान?

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चंडीगढ़
पंजाब में बीते करीब दो सालों से कैप्टन अमरिंदर के खिलाफ बिगुल फूंकने वाले नवजोत सिंह सिद्धू उन्हें सीएम पद से हटाने में तो सफल दिखे हैं, लेकिन अपनी रणनीति में उतने कामयाब नजर नहीं आते। कहा जाता है कि बीते दिनों कैप्टन अमरिंदर सिंह से मतभेदों के बीच उन्हें डिप्टी सीएम पद का भी ऑफर दिया गया था, जिसे उन्होंने खारिज कर दिया था। इससे साफ संकेत मिलता है कि उनकी महत्वाकांक्षा सीएम पद की रही है। लेकिन कैप्टन से संघर्ष के बाद अब जो हालात पैदा हुए हैं, उनमें भले ही वह अमरिंदर सिंह को हराते दिख रहे हैं, लेकिन अपनी रणनीति में चूकते भी नजर आ रहे हैं। कांग्रेस लीडरशिप ने नवजोत सिंह सिद्धू, प्रताप सिंह बाजवा और सुखजिंदर सिंह समेत तमाम दिग्गज जाट सिख नेताओं की बजाय रामदसिया सिख चरणजीत सिंह चन्नी को सीएम चुना है। पंजाब की राजनीति के जानकारों का कहना है कि राज्य में 30 फीसदी के करीब दलित आबादी है। ऐसे में पार्टी ने चरणजीत सिंह चन्नी को आपसी गुटबाजी से निपटने और जातीय समीकरणों को साधने के लिहाज से आगे बढ़ाया है। इस तरह से भले ही पार्टी लीडरशिप ने पंजाब में रास्ता निकाल लिया है, लेकिन यह सिद्धू के खिलाफ ही जाता दिख रहा है।

चरणजीत सिंह भी माने जाते हैं कैप्टन अमरिंदर सिंह के विरोधी
दरअसल सिद्धू के लिहाज से बात करें तो उनके लिए संतोष की बात यही है कि चरणजीत सिंह चन्नी भी कैप्टन अमरिंदर सिंह का विरोध करते रहे हैं। लेकिन सिद्धू के लिए अब सीएम पद पर दोबारा दावा करना आसान नहीं होगा। दूसरे राज्यों के उदाहरणों को भी देखें को किसी दलित नेता को सीएम बनाना तो आसान है, लेकिन हटाने के भी अपने राजनीतिक नुकसान रहे हैं। उत्तर प्रदेश में ही देखें तो मायावती को सत्ता में लाने वाली भाजपा ने जब उनसे दूरी बनाई तो उसका नुकसान ही उठाना पड़ा। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि पंजाब में कांग्रेस की सरकार वापस आती है तो इसका श्रेय चरणजीत सिंह चन्नी को मिल सकता है क्योंकि राज्य में दलितों की आबादी अच्छी खासी है।

चुनाव में हारी कांग्रेस तो सिद्धू पर फूट सकता है ठीकरा!
वहीं हार की स्थिति में इसका ठीका खुद सिद्धू पर ही फूट सकता है क्योंकि यह धारणा है कि उनके विरोध के चलते ही कैप्टन की विदाई हुई है। ऐसे में यदि आने वाले विधानसभा चुनाव में नतीजा कांग्रेस के पक्ष में नहीं रहता है तो वे निशाने पर भी आ सकते हैं। साफ है कि नवजोत सिंह सिद्धू इस लड़ाई में कैप्टन के खिलाफ जीतते दिख रहे हैं, लेकिन खुद अपनी ही रेस में पिछड़ते दिख रहे हैं।
 

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