चीन की कंपनी की ‘कंगाली’ से क्यों सहमी है दुनिया, सता रहा लेहमैन जैसी मंदी का डर

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 नई दिल्ली 
15 सितंबर 2008 की बात है, अमेरिका की बैंकिंग फर्म लेहमैन ब्रदर्स ने आधिकारिक तौर पर खुद को दिवालिया घोषित कर दिया। इस एक खबर के बाद वैश्विक अर्थव्यवस्था ने मंदी की राह पकड़ी ली और भारत समेत दुनियाभर के शेयर बाजार धाराशायी हो गए। अब ठीक 13 साल बाद एक बार फिर हालात कुछ वैसे ही बनते दिख रहे हैं। इस बार अमेरिका नहीं बल्कि चीन से मंदी की आहट सुनाई दे रही है।

दरअसल, चीन की दिग्गज रियल स्टेट कंपनी एवरग्रांड के दिवालिया होने की आशंका है। एवरग्रांड ने चीन की सरकार को बताया है कि उस पर 300 बिलियन डॉलर से अधिक का कर्ज है। भारतीय रुपयों में यह रकम करीब 22 लाख करोड़ रुपये के आसपास होगी। ये रकम चीन की जीडीपी के 2 फीसदी के बराबर है। 

इस कर्ज की वजह क्या है:  एवरग्रांड पर कर्ज का बोझ होने का मुख्य कारण कंपनी की आक्रामक नीति है। असल में एवरग्रांड ने बैंकों के कर्ज को नजरअंदाज करते हुए अपने विस्तार पर जोर दिया। कंपनी ने कई सालों तक चीन समेत दुनियाभर के बाजारों को ये एहसास नहीं होने दिया कि वो भारी कर्ज में है। बीते साल जब चीन की सरकार ने नियमों में बदलाव किए तब देश को पहली बार पता चला कि कंपनी कर्ज में है। हालांकि, तब भी एवरग्रांड ने रकम का खुलासा नहीं किया था। हालांकि, अब पहली बार आधिकारिक तौर पर एवरग्रांड ने माना है कि उस पर 300 बिलियन डॉलर से ज्यादा का कर्ज है।

 चीन की इकोनॉमी में कंपनी की भूमिका: रियल स्टेट कंपनी एवरग्रांड ने चीन के करीब 250 से ज्यादा छोटे या बड़े शहरों में करोड़ों लोगों के घर का सपना पूरा किया है। इस कंपनी में करीब 2 लाख कर्मचारी काम करते हैं और यह कंपनी हर साल चीन में करीब 38 लाख रोजगार पैदा करती थी। 

दुनिया को क्यों है डर: रियल एस्टेट सेक्टर में एवरग्रांड का दबदबा रहा है। ये कंपनी अगर दिवालिया होती है तो सबसे पहले तो वो लोग प्रभावित होंगे जिन्होंने इसके प्रोजेक्ट में कंस्ट्रक्शन से पहले ही मकान खरीद लिए हैं। ऐसे लोगों की गाढ़ी कमाई डूब सकती है। देश-विदेश की कई ऐसी कंपनियां भी हैं जो एवरग्रांड के साथ कारोबार करती हैं। उन फर्मों को भी बड़े नुकसान का खतरा है। ये डर है कि एवरग्रांड से जुड़ी कई छोटी या बड़ी कंपनियां भी दिवालिया हो सकती हैं। 

चीन की इकोनॉमी पर असर: इसके अलावा चीन की इकोनॉमी को भी नुकसान पहुंचेगा। ये संभव है कि चीन के इकोनॉमी की रफ्तार सुस्त पड़ जाए। ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि एवरग्रांड के दिवालिया होने की स्थिति में चीन सरकार बैंकों और अन्य उधारदाताओं को कम उधार देने के लिए मजबूर कर सकती है। इससे क्रेडिट संकट के रूप में जाना जाता है। सरकार अगर कंपनियों को सस्ती दरों पर पैसे उधार नहीं देती है या दिक्कत करती है तो इससे प्रोडक्शन भी प्रभावित होता है।

दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के लिए एक क्रेडिट संकट बहुत बुरी खबर होगी, क्योंकि जो कंपनियां उधार नहीं ले सकती हैं, उनके लिए विकास करना मुश्किल है, और कुछ मामलों में परिचालन जारी रखने में असमर्थ हैं। यह विदेशी निवेशकों के लिए भी निराश करने वाली खबर होगी और उनकी दिलचस्पी चीन में कम हो जाएगी। वहीं, एक आशंका ये भी है कि एवरग्रांड क्राइसिस के बाद चीन सरकार कंपनियों के लिए भी नियम सख्त कर सकती है।

 

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